मैंने कभी नहीं चाहा, तुम्हे दर्द में देखना,

 मैंने कभी नहीं चाहा,

तुम्हे दर्द में देखना,

आज भी नहीं चाहती हूं,

कभी तुमने खुद से जुदा किया था मुझे,

आज मैं तुम्हें खुद से आजाद करती हूं,

दर्द जो तुम लौट के सह रहे हो,

वो मैंने तुम्हारे चले जाने पे सहा था,

और आज जब तुम दावा करते हो

टूट के भी मुस्कुराने का,

तो देखना कभी मेरी मुस्कुराहट को,

जो आंखों के काले घेरे छुपाती है,

फिर लौट जाना अपनी दुनिया में तुम भी,

जहां मेरा कोई वजूद ना हो,

जहां मेरी कोई याद ना हों,

और करना कोशिश खुश रहने की तुम भी,

मैं दुआ करूंगी तुम्हें जहान कि हर खुशी मिले,

मगर मैं तुम्हें फिर मिल जाऊ,

ऐसी कोशिश भी अब मुझसे नहीं होगी।

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